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View Full Version : “ Koyla”- Bhramar –Hindi poem


shuklabhramar5
February 12th, 2011, 09:25 AM
“ Koyla”- Bhramar –Hindi poem
Kya hans doon mai,
Hua “Koyla”
‘Koyal” naa hoon,
kook kook kar
tumhe rijhaun,
khud ko mai
jhuthlaun.

Pahle se hi ,
Jala hua hoon,
Kudrat ka hoon mara,
Maar jor ki
Lagi hamare,
‘Dagdh hriday par
abhi samhale,
bana nahi mai “Raakh,”
Berahmi duniya ki dekho,
Kuchh bhi n pahchan,
Apne swarth ki khatir,
Nit nit roj lagate”Aag”
Jalne se kuchh
Dard to hota,
Unko kya ahsaas.

Lakh chhipa do,
Mn to rota,
Kya jaane
Hansna kya hota,

Jinki khatir –
Jala-gaya mai,
Jeevan deta
Naa sochen vo ,pal-
Bhar bhayi,
Ant mera kuchh
Achchha hota.

Kabhi jalayen,
Kabhi bujha den,
“Roti apni Senke”
raakh huye bhi
gandi naali ya
naala he fenke.

Tukur tukur bs
Taake -jaun,
Naala jb ye
Bahta-jaata,
Badhta-jaata,
Us “Ganga” ki oar,
Jahan’ Bhagirath’
Ke purvaj sab,
‘tare’ huye the,
paaye the ek chhor.

Mera ‘TP’ bhi kya –
Kuchh kam hai??
Ganga tak to-
Jaun-shayad kal,
Fir banun aur kuchh-
Hans paaun-
aur hansaun.

6.34A.M. 12.2.11 Jal(PB).

----------------------------------------------------------------------------------------------

काहे खून तेरा प्यारे अब
खौलता नहीं ---??
तोड़ लिया कोई फूल तुम्हारा
खाली हो गयी क्यारी
उजड़ जा रहा चमन ये सारा
गुल गुलशन ये जान से प्यारी
खुश्बू तेरे मन जो बसती
मिटी जा रही सारी
पत्थर क्यों बन जाता मानव
देख देख के दृश्य ये सारे
खींच रहा जब -कोई साड़ी
काहे खून तेरा प्यारे अब
खौलता नहीं ---??
--------------------------
साँप हमारे घर में घुसते
अंधियारे क्यों भटक रहा
जिस बिल से ये चले आ रहे
दूध अभी भी चढ़ा रहा ?
तू माहिर है बच भी सकता
भोला तो अब भी भोला है
दोस्त बनाये घूम रहा
उनसे अब भी प्यार जो इतना
बिल के बाहर आग लगा
बिल में ही रह जाएँ !
काट न खाएं !
इन भोलों को !!
लाठी क्यों ना उठा रहा ??
काहे खून तेरा प्यारे अब
खौलता नहीं ---??
------------------------
तोड़-तोड़ के पत्थर दिन भर
बहा पसीना लाता
धुएं में आँखें नीर बहाए
आधा पका - बनाता
बच्चों को ही पहले देने
पत्तल जभी सजाता
मंडराते कुछ गिद्ध -बाज है
छीन झपट ले जाते
कल के सपने देख देख के
चुप क्यों तू रह जाता
काहे खून तेरा प्यारे अब
खौलता नहीं ---??
---------------------------

शुक्ल भ्रमर ५
२०.०७.२०११ जल पी बी
८.५५ पूर्वाह्न
------------------------------------
भैया का गहना है बहना !!
रक्षा -बंधन और मिठाई

बहना मेरी दूर पड़ा मै
दिल के तू है पास
अभी बोल देगी तू "भैया"
सदा लगी है आस
-------------------
मुन्नी -गुडिया प्यारी मेरी
तू है मेरा खिलौना
मै मुन्ना-पप्पू-बबलू हूँ
बिन तेरे मेरा क्या होना !
---------------------------
तू ही मेरी सखी सहेली
कितना खेल खिलाया
कभी -कभी मेरी नाक पकड़ के
तूने बहुत चिढाया !
--------------------
थाली में तू अपना हिस्सा
चोरी से था डाल खिलाया
जान से प्यारी मेरी बहना
भैया का गहना है बहना !!
----------------------------
जब एकाकी मै होता हूँ
सजी थाल तेरी वो दिखती
चन्दन जभी लगाती थी तू
पूजा -मेरी आरती- करती !
रक्षा -बंधन और मिठाई
दस-दस पकवान पकाती थी
-----------------------------
बाँध दिया बंधन से तूने
ये अटूट रक्षा जो करता
मेरी बहना सदा निडर हो
ख़ुशी रहे दिल हर पल कहता
-------------------------------
जहाँ रहे तू जिस बगिया में
हरी-भरी हो फूल खिले हों
ऐसे ही ये प्यारा बंधन
सब मन में हो -गले लगे हों
-------------------------------
तू गंगा गोदावरी सीता
तू पवित्र मेरी पावन गीता
तेरी राखी आई पाया
चूम इसे मै गले लगाया
-----------------------------
कितने दृश्य उभर आये रे
आँख बंद कर हूँ मै बैठा
जैसे तू है बांधे राखी
मन -सपने-उड़ता मै "पाखी"
---------------------------------
तेरी रक्षा का प्रण बहना
रग-रग में राखी दौडाई
और नहीं लिख पाऊँ बहना
आँख छलक मेरी भर आई
---------------------------------
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
१३.०८.११ ८.४५ पूर्वाह्न
जल पी बी

chitrala
February 12th, 2011, 09:33 AM
Bharmaar saab,
eggo rekwest hai... agar ho sake to apni saari rachnaayein ek hi thread mein post karne ki koshish karein. Aur choonki aap hindi section mein post kar rahe hain to agar devanagri lipi mein post kar dengein to achchha rahega...

sadharan bolchal roman lipi mein jaari rakh sakte hain... par agar apni kavitayein devanagri mein prakashit kar dete to hum chand hindi pathako.n ko aasaani ho jaati.

sadhanyavad,
bhavdiya,
chitrala.

shuklabhramar5
February 12th, 2011, 09:44 AM
Chitrala saab,
Dhanyavaad aap ki salah ke liye , hindi devnagri me type karna thoda mushkil hai ..ek he thread me kaise anek rachnaye daalun ..shirshak alag alag hai to ..fir ek he din to sb nahi daalna n.....

bhavdiya.
surendrashuklabhramar.

chitrala
February 12th, 2011, 09:59 AM
chitrala saab,
dhanyavaad aap ki salah ke liye , hindi devnagri me type karna thoda mushkil hai ..ek he thread me kaise anek rachnaye daalun ..shirshak alag alag hai to ..fir ek he din to sb nahi daalna n.....

Bhavdiya.
Surendrashuklabhramar.

भ्रमर सा'ब,
अापकी शीघ्र प्रतिक्रिया के लिये धन्यवाद!
मैं अापकी देवनागरी में type करने की समस्या को समझ सकता हूँ. मैंने अापसे एक ही सूत्र में प्रकाशन का निवेदन इसीलिये किया था कि इससे अापकी समस्त रचनाएं एक ही जगह संकलित रहेंगी अौर पाठकों को वाचन करने में सुविधा होगी।
अाप हरेक post का शीर्षक अासानी से परिवर्तित कर सकते हैं, जैसा कि मैंने किया है। अौर अाप किसी सूत्र में भी अपने post कभी भी डाल सकते हैं ।

सधन्यवाद,
अापका शुभेच्छु,
चितराला.

swami
February 12th, 2011, 10:18 AM
Chitrala bhai,
Devnagri type karne ka aasaan tarika bhi bata dete to hum aapko dhanyawaad dete :thanks: aise

भ्रमर सा'ब,
अापकी शीघ्र प्रतिक्रिया के लिये धन्यवाद!
मैं अापकी देवनागरी में type करने की समस्या को समझ सकता हूँ. मैंने अापसे एक ही सूत्र में प्रकाशन का निवेदन इसीलिये किया था कि इससे अापकी समस्त रचनाएं एक ही जगह संकलित रहेंगी अौर पाठकों को वाचन करने में सुविधा होगी।
अाप हरेक post का शीर्षक अासानी से परिवर्तित कर सकते हैं, जैसा कि मैंने किया है। अौर अाप किसी सूत्र में भी अपने post कभी भी डाल सकते हैं ।

सधन्यवाद,
अापका शुभेच्छु,
चितराला.

chitrala
February 12th, 2011, 10:32 AM
Chitrala bhai,
Devnagri type karne ka aasaan tarika bhi bata dete to hum aapko dhanyawaad dete :thanks: aise
स्वामी जी,
मैं तो mac का in-built system का उपयोग करता हूँ....epic browser अापको हिंदी में type करने की सुविधा प्रदान करता है... google transliteration का प्रयोग भी किया जा सकता है...या फिर hindipad या quillpad की सुविधा ली जा सकती है....firefox के कुछ add-ons भी हैं...
https://addons.mozilla.org/en-us/firefox/addon/pramukh-type-pad/
https://addons.mozilla.org/en-us/firefox/addon/hindi-spell-checker/

swami
February 12th, 2011, 10:48 AM
अब हम हिंदी सिख गए :up:

Peaceseeker हो कहाँ :smartass:

धन्यवाद Chitrala जी

:cool::cool::cool:
http://www.echarcha.com/forum/images/misc/progress.gif

shuklabhramar5
February 12th, 2011, 10:52 AM
Kandhe par “Bora”(juit bag)
Vo taange,
Sheet lahar me
Simta sa,
Kuchh kaagaj kuchh-
Keel v raddi,
Plastic shayad
Binta tha,
Najren kabhi uthata-
Tha n. koore par –
Bas aankhen,
Kabhi hanse kuchh-
Baat kare khud-
“Paagal” sa gata-
jata. kabhi kisi ko-
dekhe hansta,
daant shwet –
chamkaata tha,
Mai bhauchakka
Khada dekhta,
Is haalat me
Paley jiye vo,
Kaise hansta??

Bhaun bhaun kr
Jab kuttey bhoonke,
Najar gayi us oar,
Kuttey ke sang
Vo ladta tha,
Jaise koi ‘chor’

Chheena jhapti
Kiski khatir
Naa sona na chandi-
Bandhi gathri
me dikhi ek,
Sookhi Roti,
Jo sone here
Se badhkar
Bhookhe ko-
bs hoti.
8.15 P.M. 12.2.11
Jal(PB)

raniraja
February 12th, 2011, 11:55 AM
@shuklabhramar5 .. try this for hindi typing : http://www.quillpad.in


@moderators.. what is the relation of the "who killed aarushi" poll to this thread? :dontknow: Please delete the poll or move it to another thread or whatever.

shuklabhramar5
February 12th, 2011, 12:29 PM
@shuklabhramar5 .. try this for hindi typing : http://www.quillpad.in


@moderators.. what is the relation of the "who killed aarushi" poll to this thread? :dontknow: Please delete the poll or move it to another thread or whatever.

Thanx for ur comments i tried to delete the comment but sorry could not edit as forget the link from where to go for edit polls ...can u tell me just now pls?????????

shukla bhramar

shuklabhramar5
February 12th, 2011, 01:24 PM
कंधे पर बोरा (जूट का थैला )
वो टाँगे ,
शीत लहर में
सिमटा सा ,
कुछ कागज़ कुछ -
कील व् रद्दी ,
प्लास्टिक शायद
बिनता था ,
नजरें कभी उठाता -
था न . कूरे पर –
बस आँखें ,
कभी हँसे कुछ -
बात करे खुद -
“पागल ” सा गाता -
जाता . कभी किसी को -
देखे हँसता ,
दांत श्वेत –
चमकाता था ,
मै भौचक्का
खड़ा देखता ,
इस हालत में
पले जिए वो ,
कैसे हँसता ??

भौं भौं कर
जब कुत्ते भूंके ,
नजर गयी उस ओर ,
कुत्ते के संग
वो लड़ता था ,
जैसे कोई ‘चोर ’

छीना झपटी
किसकी खातिर
ना सोना न चाँदी -
बंधी गठरी
में दिखी एक थी ,
सूखी रोटी ,
जो सोने हीरे
से बढ़कर
भूखे को -
बस होती .
८ .१५ मध्याह्न . १२ .२ .११
जल (पंजाब ) सुरेंद्रशुक्लाभ्रम्रर

PeaceSeeker
February 13th, 2011, 06:10 AM
अब हम हिंदी सिख गए :up:

peaceseeker हो कहाँ :smartass:

धन्यवाद chitrala जी

:cool::cool::cool:
http://www.echarcha.com/forum/images/misc/progress.gif

यहीं हैं. साइड चेंज्ड.

shuklabhramar5
February 19th, 2011, 07:12 AM
“ Koyla”- A collection of hindi poem (Kavita) by Bhramar.
..........".कोयला".....

ऐसे न मै बना ' कोयला '
देख - देख अन्दर धधका था
कितनी लाशें - " रोटी" खातिर ,
कहीं दबे- कुछ गए - दबाये ,
'' आह' ' से उनके आग लगी ,
भला यही सब रोका मैंने ,
हुआ कोयला,
नहीं तो दुनिया आग जली, .

सुरेंद्रशुक्लाभ्रमर
१९.२.११

..............कुटिया खुद की जला ली....
इतना पढ़ लिख,
ज्ञानी - विज्ञानी
क्या- क्या उपाधियाँ पा - ली
नयी खोज में -
दिशा - भटक के
"कुटिया" खुद की जला ली.

सुरेंद्रशुक्लाभ्रमर
१९.२.११
<<<<< 'राहत' >>>>>>

पहले ' राहत ' मिलने से ,
दिल बाग़ बाग़ हो जाता था ,
कैद भली - मन को अब लागे ,
बाहर ' झूठा ' नाता था.

सुरेंद्रशुक्लाभ्रमर
१९.२.११

<<<< काँटा अपने घर मत पालो>>>

काँटा अपने घर मत पालो.
इतना ही जो शौक तुम्हे - तो
जाओ उसकी "बाड़"- लगा दो
उस 'सीमा' के पास.
सुरेंद्रशुक्लाभ्रमर
१९.२.११

shuklabhramar5
February 25th, 2011, 03:32 AM
मेरी "रिसर्च" " मुंह में राम -बगल में छूरी"
Shukla bhramar –Kavita-Hindi poems.

बाप की -रंगरेलियां
नए नए -क्लब
काल सेंटर
मसाज सेंटर
सुर्ख़ियों में -नामचीन
अँधेरे में बढ़ते कदम
देख-बड़े के होश उड़े- कान खड़े
प्रतिरोध -रोज -रोज
मर्यादा -बाप और पूत की
टूटी.
और बाप ने - पैसे की लालच में
एक अनमोल 'हीरा' जुदा कर -
अपना अंग काट लिया
अपने ही हाथ से .

छोटा तो "छोटा" था
प्यारा-मॉडर्न -नया जनरेशन
ओत-प्रोत -यूरोपियन -
कल्चर का -जैसे का तैसा -
कापी - हर -कापी राइट -
उसके पास- लिखता
लिखता -बढ़ा चला -
"काले" से "लाल " रंग -
चुनता - चला गया
अडल्टरेसन
माडरेसन
अमल्गमेसन
बिना पास -बिना वीजा के
सात समंदर पार
आर्गनायिजेशन
निउज चैनल -मीडिया
बाप -बेटे -छाये
धरे गए -पाँव में बेड़ियाँ -
धड़कन -मंद
विदेशी दवा-दारु ने
छोड़ दिया साथ
कुछ न बचा हाथ
बची यादें -कडवी दवाओं की
देशी- देश- प्यारा-प्रेम
अनमोल "हीरा" उन्हें
पल-पल याद आया
और फिर उनकी समझ
पक्की हो गयी
की हर साथी - साथ रहने वाला -
"तोता' साथी नहीं होता .

और फिर मेरा प्रोजेक्ट
रिसर्च पूरी हो गयी
मैंने "हीरे" को उनसे मिलाया
बचाया - अटकी हुयी 'सांस'.
फिर मैंने मुहर लगा दी खुद
अपनी उपाधि के
विषय पर - कि
"दर्पण" झूठ नहीं बोलता-
परछाई बना हर साथी -
"साथी" नहीं होता.
"आस्तीन" में 'सांप' भी होता
"कड़वी दवा" अच्छी होती
और 'मुंह' में 'राम' - बगल में
कभी -कभी "छूरी" भी होती .
सुरेन्द्रशुक्लाभ्रमर
२५.२.११.
A COLLECION OF HINDI POEMS BY BHRAMAR-NAARI ,PAGLI, PATANG..

shuklabhramar5
February 26th, 2011, 07:47 AM
" कोशिश "
अन्धकार !
एक किरण फूटी,
'कोने' से - एक झरोखे से
'वो' - निकला - बढ़ा,
मुस्कराया-
अभिवादन किया
फिर चढ़ने की 'कोशिश'
आसमान में उड़ने की तमन्ना..
थोडा चढ़ा ..गिरा....
फिर चढ़ा -गिरा..
गिरा -गिरा-गिरा....
फिर - गिरा-
हम हँसते -ठहाके लगाते रहे
गिरने पर हँसने की आदत है -
हमें - बालपन से
गिरने पर - मजा आता है,
लड़खड़ाते बच्चे पर
'रेस' लगाते घुड़सवार पर
थिरक-थिरक गिरती कटी - पतंग पर
पत्थर की 'चोट खाए' गिरते 'आम' पर
'पतझड़' में झरझरा - गिरते पत्तों पर
बारिश की बूंदों पर-
फसलों को चौपट करते 'ओलों' पर
सूरज से 'जेठ' में गिरते शोलों पर
पहाड़ से गिरते झरनों पर
कुश्ती में चित्त पहलवान पर
विधानसभा - संसद में भड-भडाकर-
गिरती सरकार पर ,
दलाल - स्ट्रीट में गिरते "शेयर" पर
प्याज टमाटर के बढ़ते- गिरते मूल्य पर
पटरी से लुढ़कती - एक के ऊपर एक-
चढ़ते - गिरते 'रेल' के डिब्बों पर -
और भी न जाने कितने -किस किस पर
और तभी 'वो' हमारा -
हंसी का पात्र - 'जोकर' -"नायक" -
धमधमाते - ऊपर चढ़ा,
सारी " रौशनी" फोकस उसके ऊपर
छोड़ हाथ - 'आसमान' में- 'जम्प' -
कलाबाजियां - 'ये' मंच वो 'मंच'
छोड़ता - पकड़ता - उड़ता चला-
हमारी आँखें फटी की फटी
सर उठाये उस 'जोकर' को
आसमान में ताकते
सोचते पड़े -कि
गिरने वाला ही - चढ़ सकता है
बढ़ सकता है -
"एक- कोशिश"
रोने से - मुस्कराहट
अंधकार से उजाले
ज़मी से आसमां तक
फैली है - 'जो'
सुरेन्द्रशुक्लाभ्रमर
२६.०२.२०११
जल (पी.बी.)
८.१० पूर्वाहन .

shuklabhramar5
February 28th, 2011, 02:14 AM
"मैदान-ए-जंग" में डटे युवा खिखिया रहे -

आज कुछ नया नहीं
ऊँघता उठा -चाय -चुस्की
नित्यकर्म-अख़बार
इसने लूटा -उसने मारा-
ये घोटाला -वो घोटाला
अपने कमरे में बैठा
इतनी बड़ी दुनिया -"ग्लोब"
ऊँगली से घुमाता रहा
करीने से सजा -सजाया कमरा
किताबें -पोथी -कुछ पन्ने
बस - एक कवि की अमानत
बाहर शीत लहर -शर्द हवाएं
धुंध का आवरण
जिसमे जुड़ा है -धुंआ
चूल्हे में जलती लकड़ी का -
मिल का -
भांय-भांय-दौड़ती गाड़ियों का
श्मशान में -दुनिया को विदाई
देते गम का -
बाहर अंधकार -हमें क्या
उससे -सरोकार !
खून गरमाया -खेत-मैदान-
मंदिर -बाजार-स्टेशन
घूमने निकला - देखा
मंदिर में भीड़ -शोरगुल
घंटे -शंख-भजन-कीर्तन
ऊँचे शिखर-जमीं पर बैठे
लोग -कतार में -कुछ के
हाथ में कटोरियाँ --रटा-रटाया
एक 'जबान'- दे दाता के नाम -
तुझको अल्ला - रक्खे राम !!!
स्टेशन पर जुदा होते
लोगों का दर्द -विरह
ट्रेन पकडे -कुछ दूर दौड़ते लोग
अंत में दो आंसू टपकाने को
- "खोया" - किसी ने - झकझोरा -
एक युवती -एक को पीठ में बांधे -
दो को पीछे घुमाते..
बाबू- दे न कुछ पैसे -
शादी है बेटी कुआंरी है -
घर जल गया है -
फिर ..एक युवक.. मेरी जेब कट गयी
-घर जाना स़ाब- टिकट भर का ..
next in other page>>>>>>>
-----------------------------------------------------------------------------

किस घर बैठूं -किसका खाऊँ ?

हाथी मेरा खाता पीता
सुस्त चले - रहता बस सोता
अश्वमेध का सपना आया
घोडा चुन-चुन लाया
हाथी पर चढ़ कभी परिक्रमा
जब पूरी ना हो पायी
अश्वशक्ति - कुछ मंत्री- तंत्री
ले उधार तब-इच्छा पूरी कर पायी
सूरज ढलने को आया जब
अँधेरा ना हो जाए !
इसी लिए घर आग लगाया
उजाला -कुछ दिन रह जाए !!
उत्तर हाथी, उत्तर काशी
उत्तर शिला -उत्तर लोढ़ा
चार धाम- मन में आया
साँसें अटकी -जीवित क्यों हूँ
संसद में ला पास करा लूं
अपनी मूरति - कुछ गढ़वा के
चौराहे - मंदिर -में ला -दूँ

---------------------------------
उसका ख्याल ये देख -देख कर
दल-दल मै फंसता जाऊं
अभी एक हैं भाई मेरे
जाऊं थोडा मिल आऊँ !
कल वे बँटे दीवारों होंगे
किस घर बैठूं - किसका खाऊँ ?
-------------------------------
बार्डर पर जाते ही भैया
एक -मुछंडे ने - रोका !
“बौने” छोटे- वहां बहुत हैं
तेरा "कद" अब भी ऊंचा !!
वीसा -पासपोर्ट -ले आओ
बंट जाए- तो फिर- घर जाओ
अब वो गाँव देश ना प्यारा
अब ये है पर-देश
मारा मारी -विधान -सभा में
नहीं मिला सन्देश ??
-----------------------------------
दो रोटी खाकर मै जीता
कीचड़ वाला पानी भाई
सूखे कुएं का - अब तक पीता
ये कंकाल लिए अपना मै
कैसे पासपोर्ट बनवाऊँ ?
मगरमच्छ हैं -गिद्ध बहुत हैं
भय है- ना नोचा जाऊं !
----------------------------------
मन चाहे पत्थर की मूरति से
मिल मै - कुछ रो आऊँ
हाड मांस का पुतला अपना
आंसू - थोडा दिखलाऊँ
-------------------------
इस आंसू में शक्ति बहुत है
थोडा उनको समझाऊँ !
जो सजीव "पाथर" हैं मिल लूं
आँख मिला के -बतलाऊँ
जहर भरा है जिनके रग में
आंसू थोडा- मिला के आऊँ !
मुई खाल की सांस की गर्मी से
थोडा मै पिघलाऊँ !
मन में उनके जो इच्छा है
मार -उसे थोडा मै पाऊँ !
यहाँ पे राज करेंगी मौसी
वहां पे मामा कंस !
विद्वानों को तहखाने कर
मिलकर लेंगे डँस !!
-----------------------------
भ्रमर ५
यच पी
२२.११.११ ८.१५-८.५४ पूर्वाह्न

shuklabhramar5
February 28th, 2011, 02:17 AM
maidan-e-jang me date yuva
फिर ..एक युवक.. मेरी जेब कट गयी
-घर जाना स़ाब- टिकट भर का ..
छूटता - झटकता - जा पंहुचा -रौनक-
'बाजार' -काजू -बादाम की दुकान
-मै तोहफे में बांटने को - चुनता -
तरह तरह के सैम्पल
फिर एक घिघियाती आवाज ..
हृष्ट -पुष्ट युवती ..गोद में झांकता
बच्चा.. हे बाबू ..दे न ..कुछ..
बच्चा भूखा है कल से ..कुछ नहीं खाया..
बच्चा हँसा -शायद ये सोच कि मै 'फंसा'
मै सोचता रहा ..
कितने अच्छे लोग हैं - हमारे - 'देश' के
भरी दुकान में घुसे - 'भूखे'
मगर न 'लूटे' - न कुछ खाते
next in other page>>>>>>>>>>>>.

shuklabhramar5
February 28th, 2011, 02:21 AM
MAIDAN-E-JANG ME DATEY YUVA..

लौटते अपने घर - आशियाने को
गुमशुम -गुमनाम 'मै'
धुंधलके में शाम को ..
देखा कुछ तम्बू - खाली जमीन पर
कब्ज़ा -जमाये लोग- कुछ जाने -
पहचाने चेहरे .. औरतें बच्चे ..
'टेप' , 'टी.वी.' शोर -शराबा
हंसी - ठहाका ..मस्ती -मजा
'कुछ' छीलते - तलते - भूनते -
मसालों की - अजीब गंध .
shuklabhramr..see next page

shuklabhramar5
February 28th, 2011, 02:32 AM
MAIDAN-E-JANG ME DATEY YUVA KHIKHIYA RAHE...

सुबह हो गयी - दिन निकला
गोद में बन्दर से लटके
मासूम - बच्चे - नंगे चिथड़ा पहने
पान खाए महिलाएं -छोकरियाँ
हाथ में 'कटोरियाँ' -कुछ बच्चे -सम्हाले
निकल पड़े -अपनी डिउटी पर

see next page ..due to some error in website ..

shuklabhramar5
March 5th, 2011, 06:51 AM
बकरी सा मिमियाता –“मजबूरी” दिखाता-कठपुतली इस मैदान -उस मंच …

'मजबूर' - लाचार
भोली आँखों वाला “बूढ़ा”
“ताकतवर” - कलाबाजी में माहिर
जिसका गजब का आचार
व्यवहार !!!
बहुत दिनों से लोग उसे
जानते -पहचानते
मानते !!
साथ चलते !
आज घबराता -
‘चेहरा छिपाता’ - घूमता
उसकी आँखों में
बोल में -खेल में
"रहस्य" भरा दिखता
आग से कूदने में - डरता
घबराता - दो शब्द बोलता
"बकरी सा मिमियाता"-
“मजबूरी”- दिखाता
हाथ जोड़ !!

लोगों के सामने -
मंच पे यहाँ -वहां
जहाँ भी जाता
अपनी "ताकत" को भूलता
जैसे हनुमान को किसी ने
“श्राप” दिया हो
बस आँखें झपकाता
दिखाता मासूमियत बेबसी
"खेल" नहीं
जिसके इंतजार में
धूप में बारिश में
एक पाँव पे खडी -भूखी
उसकी प्यारी “जनता –दर्शक”
न करिश्मा न दांव -पेंच
न जाने क्या हुआ
जरा सा इशारा -"डोर" हिली
बार -बार भागता -
अँधेरे में झांकता
“परदे के पीछे” बैठे -
छिपे लोगों के पास-
दौड़ जाता
दोस्ती का हाथ बढाता
पूँछ हिलाता-
"वो बन्दर"
फिर सामने आ जाता
कूदता -उछलता
दांत दिखाता -पब्लिक को
बेवकूफ बनाता-बहलाने
फुसलाने की कोशिश करता
कुछ पचासों साल के घिसे
पिटे खेल करतब करिश्मा
दिखाता -बिना होश -बिना जोश के
और पेट पकडे -मासूम आँखे
"मज़बूरी" दिखाते
लुढ़क जाता-
लौट जाता
जनता तिलमिलाई -
गुस्साई -भांप गयी
दौड़ गयी -ले मशाल
अँधेरे में परदे के पीछे
"कौन" शक्तिशाली
‘बड़े लोग’ -उसका ‘खेल’
बिगाड़ रहे
"गुलाम" -"कठपुतली"
बना -एक डोर में बांधे
उशको अपने इशारे -
ऊँगली पे नचा रहे-
भर रहे तिजोरी
जिसकी कटोरी- में
डालते -दाना
हम
बरसों से खिला रहे
शुक्लाभ्रमर-५
५.३.२०११ जल पी बी

shuklabhramar5
March 8th, 2011, 07:42 PM
पकड़ा गया लुटेरा देखो

पकड़ा गया लुटेरा देखो
भीड़ जुटी है भारी
घेर खड़े हैं -लगा तमाशा
जुटे चप्पल - नहीं तालियाँ
देते फिरते - गाली
पकड़ो - पीटो मारों इसको
भारी आज मचा है शोर
ऐसे जकड़ा मंद पड़ा है
पिजड़े में वो बंद पड़ा है
जैसे कोई "आदमखोर"
यही भीड़ जो आगे जुटती
कभी सिखाती - कभी परखती
कान पकड़ जो उठा - बैठ
कुछ उसे कराती
आग लगाने पर उसके
ना चूमा करती
क्या गोरा क्या काला
कुछ सिखलाया करती
गोदी में भर - प्यार दिए
"डोर" एक बांधे रहती
होता काहे आज 'तमाशा"
क्यों कर वो भर ले जाता-
सब घर - बीस साल से खाता
घुन सा - किया खोखला
"आप"- पोपला
पेड़ हुआ है
खड़ा अभी है
जीवनदायी
हरा - भरा है
आओ - हाथ जोड़ लें भाई
सब मिल उसमे पानी डालें
सींचे - रोज -सम्हालें
नजर रखें-
हर "घुन" - कीड़े पर
और नहीं अब खाए
"गजनी" - "गोरी" सा
भर - भर के
बाहर भी ले -जाये .
सुरेन्द्रशुक्लाभ्रमर५
८.१.२०११ जल पी बी

shuklabhramar5
March 23rd, 2011, 11:56 AM
“ज्वालामुखी ”
ज्वालामुखी हूँ
बच के रहना
अभी धुआँ है
फूट पडूँगा
अंगारे तन -आग भरी है
शोले हैं -चिनगारी
कब तक -"बंकर " में
छुप रहना ???
अंधियारे में गुम-सुम गुम-सुम
परत- आज कमजोर हो रही
"कोलाहल" है
भरा हुआ - काला ये सारा
"छाती"- में !!
बना जा रहा कोयला
अंगार दहकते -
भूल जा सारी -शक्ति अपनी
नहीं सख्त है -अभी वक्त है
लावा बनकर-
बह निकलेंगे
तोड़- फाड़ के पत्थर
"पानी" बन जा -एक झील
झरने सा मिल जा -
आके इस विशाल से
"शांत" -समुन्दर
हलचल तेरी -कुछ कम होगी
"तुम " से अगर -
अथाह मै देखूं
-"शीतल" -सारे
सभी मिले हों -
साथ खड़े हों -
मुस्काते हों -
कुछ गाते हों
अपनी धुन -संगीत प्रकृति में
"लीन" -अगर हों
ठंडा -शायद मै हो जाऊं
कुछ दिन सोया पड़ा
"धरा"- में
गति -विधियों पर
नजर -गडाए
गड़ा -रहूँगा .

शुक्लाभ्रमर५
१०.३.२०११ जल पी बी

shuklabhramar5
April 9th, 2011, 09:43 PM
"मुठीयन भर बाल नोच मार देत पैयाँ"

टुकुर टुकुर ताकि मातु ममता की छैंया
किलकि किलकि रोय उठत देखि परछैयां
कबहुं हंसत फिर रिसात लेत ना कनैयां
चीख सुन दौड़ धाय लेत माँ बलैंया
गोद में लुकाय ढाकि आँचरा कि छैयां
गाई गान सुधा पान हरषि हरषि मैया
कोष देत सब लुटाई नाचत अंग्नैया
सो जा ललन लोरी गाई रही मैया
नटखट वो पलक मूँद -झूंठ- लरकैयां
"मुठीयन भर बाल नोच मार देत पैयाँ"
छनकत कंगना कबहु छनकी पैजनिया
मोहि लेत- बूँद छलकि जात भरी अँखियाँ
उमड़-घुमड़-प्रीति-प्यार-बादरा कि नैंया
खेल रही माँ बिभोर लरकन कि नैया
लहर -लहर -ह्रदय-सिन्धु-चूमि के कलईया
चूमि मुख गात चूमि पागल सी मैया
नजर से लुका छिपाई उर में भरत मैया
कजरा-नैनो मी झाँकि माथ टीकि पैंया
"भ्रमर' ख्वाब अंक भरे खोयी हुयी रनिया
खोलि मुख चूमि दोउ नाच -बनी-बतियाँ .

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
८.४.२०११
(लेखन २.६.१९९६ हजारीबाग झारखण्ड)

shuklabhramar5
April 10th, 2011, 11:26 PM
मानवता को हे मानव तू अमृत पिला जिलाए
आज प्रभा ने भिनसारे ही
मुस्काते अधरों से बोला

http://Image021.jpg
कितने प्यारे लोग धरा के
उषा काल सब जाग गए हैं
घूम रहे हैं हाथ मिलाये
दर्द व्यथा सब चले भुलाये
सूर्य-रश्मि सब साथ साथ हैं
कमल देख ये खिला हुआ है
चिड़ियाँ गाना गातीं
हवा बसंती पुरवाई सब
स्वागत में हैं आई
सूरज नाम है तांबे जैसा
जल निर्मल झरना कल-कल है
नदी चमकती जाती
सागर बांह पसारे पसरा
लहरें उछल उछल के तट पर
चरण पखारे आतीं
हे मानव तू ज्ञानी -ध्यानी
प्रेम है तुझमे कूट भरा
शक्ति तेरी अपार - है अद्भुत
हाथ जोड़ जो खड़ा हुआ
खोजे जो कल्याण भरा हो
मधुर मधुर जो कडवा न हो
कड़वाहट तो पहले से है
पानी में भी आग लगी है
तप्त ह्रदय है जलती आँखे
लाल -लाल जग जला हुआ है
खोजो बदल-बिजली खोजो
सावन घन सा बरसो आज
मन -मयूर फिर नाचे सब का
हरियाली हो धरा सुहानी
छाती फटी जो माँ धरती की
भर जाये हर घाव सभी
सूर्य चन्द्र टिमटिम तारे सब
स्वागत-मानव-तेरे आयें
निशा -चन्द्र-ला मधुर-मास सब
थकन तेरी सारी हर जाएँ
मानवता को हे मानव तू
अमर करे –
अमृत पिला -जिलाये !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
१०.४.२०११ जल पी.बी.

shuklabhramar5
April 11th, 2011, 02:12 PM
[my one thread of hindi section is disappeared
with Title - PAGLI
VIEWS -615

swami
April 11th, 2011, 02:16 PM
my one thread of hindi section is disappeared
with Title - PAGLI
VIEWS -615


Some of your threads have been merged,maybe Pagli has also been merged.

shuklabhramar5
April 11th, 2011, 02:28 PM
some of your threads have been merged,maybe pagli has also been merged.

swami ji

merged with which thread i m not finding it

pls clarify

pagli having 615 views gone where ???

Bhramar5

Premi
April 11th, 2011, 02:42 PM
swami ji

merged with which thread i m not finding it

pls clarify

pagli having 615 views gone where ???

Bhramar5
:doh::doh:

Charchila
April 11th, 2011, 02:50 PM
swami ji

merged with which thread i m not finding it

pls clarify

pagli having 615 views gone where ???

Bhramar5
How many views on Naari and Ghaav? :confused:

Premi
April 11th, 2011, 03:30 PM
How many views on Naari and Ghaav? :confused:


jab pagli pe hi 615 ho gaye to naari pe to 1000 se upar jaane chahiye... waise clothes pe depend karta hai kya pahne hain... ghaav pe views kam aur marham jyada bante hain :D:D

shuklabhramar5
April 11th, 2011, 03:36 PM
[QUOTE=Premi;552518]jab pagli pe hi 615

naari to mahan hai jagadjanni hai , yahi to najron najron ka fark hota hai n -naari me to 1127 se bhi upar hain sir ji ...
good mornign n byeeeeeee
jb tk aap hamare post pr dikhoge ham soyeng kaise?? ab jaiye rest lijiye ye bogus replies hata dijiyeag pls

Premi
April 11th, 2011, 03:41 PM
[quote=Premi;552518]jab pagli pe hi 615

naari to mahan hai jagadjanni hai , yahi to najron najron ka fark hota hai n -naari me to 1127 se bhi upar hain sir ji ...
good mornign n byeeeeeee
jb tk aap hamare post pr dikhoge ham soyeng kaise?? ab jaiye rest lijiye ye bogus replies hata dijiyeag pls

naari ke maine bola ki 1000 se upar milenge ...dekha na ... ;)
aapke reply gusty aur hamaare reply bogus wah wah shukla ji wah

shuruaat kisne ki ... :D

shuklabhramar5
April 15th, 2011, 12:36 AM
premi ji hami aap ki reply ko keval nahi kaha tha bogus hm sb ki ye jo ek tarah ki chatting ho gayi thi sb nikalne ko kaha tha -log dekhenge to kya kahenge aap ko??
ek baat aur bataiyega ki photo bina url ke computer se nahi dal sakte attachment kar -kya ???

Bhramar5

[quote=shuklabhramar5;552520]

naari ke maine bola ki 1000 se upar milenge ...dekha na ... ;)
aapke reply gusty aur hamaare reply bogus wah wah shukla ji wah

shuruaat kisne ki ... :D

Premi
April 15th, 2011, 01:04 PM
premi ji hami aap ki reply ko keval nahi kaha tha bogus hm sb ki ye jo ek tarah ki chatting ho gayi thi sb nikalne ko kaha tha -log dekhenge to kya kahenge aap ko??
ek baat aur bataiyega ki photo bina url ke computer se nahi dal sakte attachment kar -kya ???

Bhramar5


daal sakte hain par server space kaahe waste karen but if you have some specific pictures then let the mods know and load it up.

shuklabhramar5
April 16th, 2011, 11:19 AM
अरे लुटेरे भाई तेरी -
क्या दूकान चली है
कल तक तो तू जुआ खेलता
‘गलियों’ में था दर्शन देता
अब 'पद्मावती' में घूमे - जाये
‘दिल्ली’ पहुंचे तो उड़ जाये
सागर के उस पार !!

कोई ‘महिला’ -कहीं अकेली
या ‘कायर’ हो पुरुष कहीं
पल भर तू फिर नहीं चूकता
हाथ सफाई-लगे कसाई !!

कामाख्या का जादू सीखा

एक “खिलाडी” को –ना- छोड़ा

टूट –फूट- कर ‘सपने’ बिखरे

फिर भी कहती मै ना हारी
ये है नारी !! अरे लुटेरे
ले ली उसकी “टांग”
तुझको ना नरसिंह मिलें
कभी बिठाते “जांघ” !!



अगर लूटना है तो लूटो
लूट रहे जो घूमे
उसी ट्रेन में टी. टी. से मिल
जेब भरे - है - घूमे
एक ‘तमाचा’ जड़ दो उसको
‘ताकत’ अपनी दिखा वहां तू
‘पहलवान’ बन जाओ !!

अगर काटना ‘पाँव’ ही तुझको
सोये -देखो ड्यूटी- हैं वो
लूट रहे -सरकार- खजाना
उनको जा के लूटो !!

कल तेरी माँ -बहना भी
सफ़र कहीं - जो कहीं अकेली
तेरे भाई मिल जायेंगे -देर नहीं
काट-काट कर- डालें -बोटी !!

इसी ट्रेन में अपनी -सेना
लव-‘लश्कर’ के साथ चले है
माना तेरी ‘सीमा’ तय है
‘दुश्मन’ से तू देश के भाई
‘जान’ लड़ाए रोज लड़े हैं
‘आँख खोल’ कर प्यारे देखो
‘दुश्मन’ तेरे साथ चले हैं
कभी कहीं कुछ ‘मोड़’ जो आये
चलती ‘ट्रेन’ कहीं रुक जाये
थोडा सा तुम ‘जागो’ भाई
‘चीर- हरण’ या कोई ‘लुटेरा’
‘आह’ भरी कानो जब आये
‘कृष्ण’ हमारे कुछ कर जाओ !!!



कार खड़ी कर सड़कों पर हम
कितना जाम लगायें -
ले परिवार शाम को आयें
वो फुल्के की और बताशा
चाट -चाटने -मटरू वाली
क्या दूकान लगी है
उस बर्तन में "मूते" -जाये
क्या संदेशा दुनिया छाये !!
इन जैसों से भी डरना क्या-
लोकपाल बिल लाना ??

चार साल की बच्ची - माँ- को
‘दफ़न’ किये हैं घर उसके
‘ताला’ उसके घर में लाये
कुछ हजार जो ना ले पाए
है पंजाब की घटना सच्ची
है -ये –चेहरा- एक "पुलिस" का
लाज-शर्म सब खाए
चुल्लू भर पानी ना डूबें
ये रक्षक कहलायें !!

कहें भ्रमर "कैप्टन" की मानों
पकड़ इन्हें तुम उल्टा टांगो
‘मूर्ति’ - इनकी ना ‘पत्थर’ की
हर ‘चौराहे’ एक- एक -कर
‘जिन्दा’ ही तुम कभी लगा दो

जिसके ‘दिल’ में ‘जान’ अभी -
धड़कन कुछ जिन्दा है भाई
रोको तुम है ‘लुटी कमाई’
जागो तुम -
अभी वक्त है -
दर्द बढ़ रहा - दिन प्रतिदिन है
‘ठेस’ लगी है -
‘खून’ बह रहा -
‘घाव’ कही ‘नासूर’ बने ना
‘जगा’ रही है ‘रोती’ माई !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
१५.०४.2011

shuklabhramar5
April 20th, 2011, 08:07 AM
आओ आज चलें उस दुनिया
खारे सागर में डूबे हम
गोता लायें मोती ढूंढें
ताज में अपने -सिंहासन में
अपने जड़ के
इस उफान में
हहर- हहर कर उठी तरंगे
चली बदलने दुनिया को जो
स्वागत उनका
आओ हाथ मिला कर -कर लें
बड़ी पुनीत है आत्मा उसकी
आओ करें समर्पण हम अब
गोदी उसकी इस अथाह में
भुला के सब कुछ
चैन से फिर सो जाएँ
तभी कल्पना मूर्त हमारी
शांति -लहर -ये रहे झुलाती
थपकी देकर
ऊपर नीचे
तन्हाई की गहराई में
जहाँ स्याह अँधियारा पलता
चाँद दिखाती
उजियारा कुछ
धवल चांदनी
दिल में अपने भर लायें
सपनों के इक राज महल में
कोई दीप जला जाये
उजियारा कर कोई प्रेयसी
जूही चंपा बेला जैसी
खुश्बू देती
अन्तरंग महका जाये
जल तरंग की-परियां जल की
व्यथा वेदना हर जाएँ
आओ खुद को करें सुवासित
अंतर अपना पुष्प सरीखा
धवल -चांदनी वेद ज्ञान से
आज आत्मा को हम अपनी
अमृत तुल्य बना डालें
हो गंगा सी -जिसमे आकर
खारा सागर -तर जाये

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
८.४.२०११ जल पी बी

shuklabhramar5
April 26th, 2011, 11:30 AM
नेता- डी. एम .- मंत्री- सारे
‘अपने घर के’- ‘अपने बच्चे’ !!
इन्हें सिखाकर हमने भेजा
गाँव -बड़ों का सब संदेसा !!
‘सड़क’ हमारी जैसे नाली
नदी ‘नाव’ न -
कितने प्यारे डूब मरे
वो किसान ले ‘कर्ज’ मरा था
चला ‘मुकदमा’ दो पुस्तों से
‘बूढ़े’ को कुछ कुत्ते नोचे
“छुटकी” को कुछ मिल के ‘बेंचे’
उसके ‘मरद’ ने उसको छोड़ा
कुछ ने ‘होली’ फूंकी
कटे -पेड़ सा ‘बाप’ पड़ा है
रोज ‘कचहरी’ चला -खड़ा है
उस घर में ‘इन्सान’ न रहते
जिनका ‘पाँव-पूज’ हम चलते
‘लात’ मार वो हमें विदा कर
मूंछों अपनी ‘ताव’ जो धरते
सब माना था उसने जाकर
‘बड़ा’ बनूँ -कुछ -कुर्सी पाकर
‘ताकतवर’ जब शासन पाऊँ
दूर ‘समस्या’ सब कर पाऊँ
उस ‘कुर्सी’ क्या आग लगी है ????
सभी ‘आत्मा’ –‘संस्कृति’ अपनी
सभी ‘समस्या’ है –‘जल’ मरती ??
‘अपने घर’ के ‘अपने बच्चे’
जब भी ‘घर’ में आयें
आओ उन्हें ‘जगा दें’ भाई
पुनः पुनः उनकी ‘आत्मा’ को
“अमृत” से नहलाएं
‘होश’ दिलाएं
इस ‘दुनिया’ की
इस ‘माटी’ की -
‘परिपाटी’ की
उनमे डालें “जान “
अगर यही ‘जागृत’ कर पायें
“भारत बने महान” !!!
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
२६.४.2011

shuklabhramar5
April 28th, 2011, 10:36 AM
रूहें यहाँ जली काया जो
हो अधमरी आह भरती है

हे ‘मन-मोहन’ -मन को मोहो
‘माया’ अपनी छोडो !!
अरे सोणिये से जा कह दे
बहू हमारी गृह लक्ष्मी है ??
तुलसी-राम के आँगन आई !
इस धरती की आज वेदना -दर्द हमारा
चिट्ठी पाती -रचना लेख
वहीँ से पढ़ ले !!

‘जन’-‘जागरण’ से जुडी रहे वो
एक ‘चिट्ठी’ तो नाम हमारे
अपने ‘मन’ की महिमा सारी
‘मन’ आये जो कभी तो ‘लिख’ दे

"शांति" रहे भूषण -आभूषण
कितने -रोज हमें मिल जाएँ
अन्ना -अन्न- हमारा भाई
बिन उसके हम ना जी पायें

तुम ‘अबोध’ –‘बालक’ से हो के
प्रेम बीज सच इस धरती पर
‘दिवस’- ‘निशा’ संग आ के बो दो

‘अलका’ सी तुम अलख जगाओ
प्रात काल की स्वर्णिम बेला
‘कमल’ के जैसे खिल के अपने
भारत को तुम हंसी दिलाओ

जो गरीब -बच्चे-भूखे हैं
पेट भरे -तुम उन्हें पढ़ा दो
हो ‘विनीत’ आदर्श प्यार से
लाल-बहादुर-‘बाजपेयी’ बन
अच्छाई का ‘यश’ तुम गा दो

राम राज्य का सपना ही न
राम-राज्य ला के दिखला दो
‘नीलम’ मोती मणि को गुंथ के
हार बनाओ हाथ मिलाओ
गले मिलाओ-‘सचिन’ के जैसे
छक्के -जड़ के विश्व पटल पर
भारत का झंडा फहरा दो !!

‘रचना’ – ‘प्रिया’ से प्रेम बढ़ा के
नारी को सम्मान दिलाओ
दीप-‘संदीप’ करो उजियारा
‘ब्रज-किशोर’ चाहे हरीश या आशुतोष बन
मंगल धरती मदन अमर कर !!

सेवा भाव सदा ही रखना
माँ का नित ही नमन करो
कोमल-कपिल-दिव्य-मृतुन्जय
विश्वनाथ बन -कंचन -बरसा दो

तू मनीष चाहे सलीम बन
आलोकित- पुलकित -मन कर दे
संगीता- रजनी या मोनिका
गृह लक्ष्मी -शारद बन जाओ

‘अख्तर’- ‘खान’ -अकेले बढ़ के
हीरा ढूंढो और तराशो
‘डंडा’ चाहे ‘चक्र’ चला दो

मथुरा में ‘दिव्या’ क्यों रोती
‘श्याम’ उसे तुम न्याय दिला दो
‘तन्मय’ हो के –‘राज’ छोड़ दे
गाँधी का तुम भजन सुनाओ !!
‘सुशील’, ‘चैतन्य’ ,’रवि’ या ‘दिनेश’ हो
धरती को जीवन दे जाओ
हे ‘देवेन्द्र’- ‘कृशन’- ‘गगन’ पर
‘सत्यम’ शिवम् सुंदरम लिख के
मोती अमृत कुछ बरसाओ !!!

आशा- लता -है कुम्हलाई जो
सींच उसे - कुछ ‘शौर्य’ सुना दे
गीत - भजन -कुछ ऐसा गा दें
युवा वर्ग में जोश जगा दे !!


‘रूहें’ यहाँ जली ‘काया’ जो
हो ‘अधमरी’ ‘आह’ भरती हैं
‘प्रेम’- ‘सुधा’ रस शायद पी के
जी जाएँ कुछ ‘क्रांति’ करें !!

‘सोच’ नयी हो- ‘भाई-चारा’
धर्म -जाति-बंधन या भय से
‘मुक्त’ हुए सब गले मिले
कहें 'भ्रमर' तब ‘दर्द’ दूर हो
बिन भय ‘दर्पण’ जब सब कह दे !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
२४.४.२०११ जल पी बी

shuklabhramar5
July 18th, 2011, 04:22 AM
उनको हमने दिया “सुदर्शन”
“भ्रमर ” कहें रखवाली लाये !
कौन जानता -सभी शिखंडी
नाच-गान ही मन को भाए !!
——————————–
मन छोटा कर घर से अब तो
“जान हथेली” ले निकले !
“दो रोटी” के खातिर अब तो
“तिलक लगा” घर वाले भेजें
————————–
छद्म युद्ध है- नहीं सामने
योद्द्धा ना – कोई शर्तें !
“कायर” ही अब भरे हुए हैं
पीठ में ही छूरा घोंपें !!
——————–
ह्रदय काँपता अब संध्या में
दिया जले या बुझ जाए !
“रोज-रोज आंधी” आती है
जो उजाड़ सब कुछ जाए !!
———————————
“ढुलमुल नीति ” से भंवर फंसे हैं
दो कश्ती पर पाँव रखे !
एक किनारे पर जाने को
साहस -नहीं -ना-दम भरते !!
———————————-
चिथड़े पड़े “खून” बिखरा है
“ह्रदय विदीर्ण” हुआ देखे !
आँखें नम हैं धरती भीगी
“जिन्दा लाश” बने बैठे !!
————————–
अर्धनग्न -महफ़िल में मंत्री
शर्म -हया सब बेंच खोंच के !
हो मदान्ध- हैं बौराए ये
इस पीड़ा- क्षण -जा बैठे !!
————————–
हंसी -ठिठोली -सुरा- सुन्दरी
जुआ -दांव में बल आजमायें
ये क्या जानें – पीर परायी
निज ना मरा -दर्द क्या होए !!
———————————–
ना जाने क्यों पाले कुत्ते
बोटी नोचे – देख रहे
ये राक्षस हैं – पापी ये
“धर्मराज” बन कर बैठे !!
——————————-
जो तुम “तौल नहीं सकते सम”
गद्दी से – मूरख – उठ- जाओ !
“हाथ” में अब भी कुछ ताकत तो
“उसको” तुम फ़ौरन लटकाओ !!
———————————–
भ्रमर ५
Bhramar ka Dard aur Darpan
१५.७.२०११ जल पी बी १० मध्याह्न
http://surenrashuklabhramar.blogspot.com

----------------------------------------------------
काहे खून तेरा प्यारे अब
खौलता नहीं ---??
तोड़ लिया कोई फूल तुम्हारा
खाली हो गयी क्यारी
उजड़ जा रहा चमन ये सारा
गुल गुलशन ये जान से प्यारी
खुश्बू तेरे मन जो बसती
मिटी जा रही सारी
पत्थर क्यों बन जाता मानव
देख देख के दृश्य ये सारे
खींच रहा जब -कोई साड़ी
काहे खून तेरा प्यारे अब
खौलता नहीं ---??
--------------------------
साँप हमारे घर में घुसते
अंधियारे क्यों भटक रहा
जिस बिल से ये चले आ रहे
दूध अभी भी चढ़ा रहा ?
तू माहिर है बच भी सकता
भोला तो अब भी भोला है
दोस्त बनाये घूम रहा
उनसे अब भी प्यार जो इतना
बिल के बाहर आग लगा
बिल में ही रह जाएँ !
काट न खाएं !
इन भोलों को !!
लाठी क्यों ना उठा रहा ??
काहे खून तेरा प्यारे अब
खौलता नहीं ---??
------------------------
तोड़-तोड़ के पत्थर दिन भर
बहा पसीना लाता
धुएं में आँखें नीर बहाए
आधा पका - बनाता
बच्चों को ही पहले देने
पत्तल जभी सजाता
मंडराते कुछ गिद्ध -बाज है
छीन झपट ले जाते
कल के सपने देख देख के
चुप क्यों तू रह जाता
काहे खून तेरा प्यारे अब
खौलता नहीं ---??
---------------------------

शुक्ल भ्रमर ५
२०.०७.२०११ जल पी बी[/SIZE]
http://surenrashuklabhramar.blogspot.com
८.५५ पूर्वाह्न